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फ़िराक़

सभी 154अशआर 0ग़ज़ल 154
ग़ज़ल154
तरस रहा हूँ मगर तू नज़र न आ मुझ को
ترس رہا ہوں مگر تو نظر نہ آ مجھ کو
ये आलम-ए-शौक़ का देखा न जाए
یہ عالم شوق کا دیکھا نہ جائے
ऐ मेरे हम-नशीं चल कहीं और चल इस चमन में अब अपना गुज़ारा नहीं
اے مرے ہم نشیں چل کہیں اور چل اس چمن میں اب اپنا گزارہ نہیں
हम भी फिरते हैं यक हशम ले कर
ہم بھی پھرتے ہیں یک حشم لے کر
कब तक तू इम्तिहाँ में मुझ से जुदा रहेगा
کب تک تو امتحاں میں مجھ سے جدا رہے گا
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