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फ़िराक़

सभी 154अशआर 0ग़ज़ल 154
ग़ज़ल154
कभी रक़्स-ए-शाम-ए-बहार में उसे देखते
کبھی رقص شام بہار میں اسے دیکھتے
थे ख़्वाब एक हमारे भी और तुम्हारे भी
تھے خواب ایک ہمارے بھی اور تمہارے بھی
खेल उस ने दिखा के जादू के
کھیل اس نے دکھا کے جادو کے
मुवा मैं सजदे में पर नक़्श मेरा बार रहा
موا میں سجدے میں پر نقش میرا بار رہا
दो दिन से कुछ बनी थी सो फिर शब बिगड़ गई
دو دن سے کچھ بنی تھی سو پھر شب بگڑ گئی
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