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सभी 154अशआर 0ग़ज़ल 154
ग़ज़ल154
उसके पहलू से लग के चलते हैं
اس کے پہلو سے لگ کے چلتے ہیں
तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो
تم حقیقت نہیں ہو حسرت ہو
उस ने हम को गुमान में रखा
اس نے ہم کو گمان میں رکھا
हर एक बात न क्यों ज़हर सी हमारी लगे
ہر ایک بات نہ کیوں زہر سی ہماری لگے
हम भी शायर थे कभी जान-ए-सुख़न याद नहीं
ہم بھی شاعر تھے کبھی جان سخن یاد نہیں
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