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यूं बहार आई है इस बार कि जैसे क़ासिद
یوں بہار آئی ہے اس بار کہ جیسے قاصد
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इश्क़ हमारे ख़याल पड़ा है
عشق ہمارے خیال پڑا ہے
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आए हैं मीर काफ़िर हो कर ख़ुदा के घर में
آئے ہیں میرؔ کافر ہو کر خدا کے گھر میں
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ज़ख़्म झेले दाग़ भी खाए बहुत
زخم جھیلے داغ بھی کھائے بہت
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आह-ए-सहर ने सोज़िश-ए-दिल को मिटा दिया
آہ سحر نے سوزش دل کو مٹا دیا
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