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ग़म

सभी 204अशआर 0ग़ज़ल 204
ग़ज़ल204
ये ग़म क्या दिल की आदत है, नहीं तो
یہ غم کیا دل کی عادت ہے نہیں تو
रही निगुफ़्ता मेरे दिल में दास्तान मेरी
رہی نگفتہ مرے دل میں داستاں میری
छाती जला करे है सोज़-ए-दरूँ बला है
چھاتی جلا کرے ہے سوز دروں بلا ہے
शेर के पर्दे में मैं ने ग़म सुनाया है बहुत
شعر کے پردے میں میں نے غم سنایا ہے بہت
सह्ल यूं राह-ए-ज़िंदगी की है
سہل یوں راہ زندگی کی ہے
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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