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ये ग़म क्या दिल की आदत है, नहीं तो
یہ غم کیا دل کی عادت ہے نہیں تو
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रही निगुफ़्ता मेरे दिल में दास्तान मेरी
رہی نگفتہ مرے دل میں داستاں میری
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छाती जला करे है सोज़-ए-दरूँ बला है
چھاتی جلا کرے ہے سوز دروں بلا ہے
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शेर के पर्दे में मैं ने ग़म सुनाया है बहुत
شعر کے پردے میں میں نے غم سنایا ہے بہت
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सह्ल यूं राह-ए-ज़िंदगी की है
سہل یوں راہ زندگی کی ہے
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