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ग़म

सभी 204अशआर 0ग़ज़ल 204
ग़ज़ल204
मुँह तका ही करे है जिस तिस का
منہ تکا ہی کرے ہے جس تس کا
था मुस्तआर हुस्न से उस के जो नूर था
تھا مستعار حسن سے اس کے جو نور تھا
ग़म रहा जब तक कि दम में दम रहा
غم رہا جب تک کہ دم میں دم رہا
शर्ह-ए-बेदर्दी-ए-हालात न होने पाई
شرح بے دردئ حالات نہ ہونے پائی
जमेगी कैसे बिसात-ए-यारां कि शीशा-ओ-जाम बुझ गए हैं
جمے گی کیسے بساط یاراں کہ شیشہ و جام بجھ گئے ہیں
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