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सभी 112अशआर 0ग़ज़ल 112
ग़ज़ल112
ऐ अब्र-ए-तर तू और किसी सिम्त को बरस
اے ابر تر تو اور کسی سمت کو برس
फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया
پھر مجھے دیدۂ تر یاد آیا
तेग़-ए-सितम से उस की मिरा सर जुदा हुआ
تیغ ستم سے اس کی مرا سر جدا ہوا
कब से नज़र लगी थी दरवाज़-ए-हरम से
کب سے نظر لگی تھی دروازۂ حرم سے
ख़ुश न आई तुम्हारी चाल हमें
خوش نہ آئی تمہاری چال ہمیں
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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