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सभी 112अशआर 0ग़ज़ल 112
ग़ज़ल112
पलकों की दहलीज़ पे चमका एक सितारा था
پلکوں کی دہلیز پہ چمکا ایک ستارا تھا
ये गर्द-बाद-ए-तमन्ना में घूमते हुए दिन
یہ گرد باد تمنا میں گھومتے ہوئے دن
दो दिन से कुछ बनी थी सो फिर शब बिगड़ गई
دو دن سے کچھ بنی تھی سو پھر شب بگڑ گئی
उस के कूचे से जो उठ अहल-ए-वफ़ा जाते हैं
اس کے کوچے سے جو اٹھ اہل وفا جاتے ہیں
ऐ गुल नौ दमीदा के मानिंद
اے گل نو دمیدہ کے مانند
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