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हुस्न

सभी 59अशआर 0ग़ज़ल 59
ग़ज़ल59
क्या कहिए कि ख़ूबां ने अब हम में है क्या रखा
کیا کہیے کہ خوباں نے اب ہم میں ہے کیا رکھا
जाँ गुदाज़ इतनी कहाँ आवाज़ ऊद-ओ-चंग है
جاں گداز اتنی کہاں آواز عود و چنگ ہے
गुल शर्म से बह जाएगा गुलशन में हो कर आब सा
گل شرم سے بہہ جائے گا گلشن میں ہو کر آب سا
वाँ वो तो घर से अपने पी कर शराब निकला
واں وہ تو گھر سے اپنے پی کر شراب نکلا
जिस जा नसीम शाना-कश-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार है
جس جا نسیم شانہ کش زلف یار ہے
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