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हुस्न

सभी 59अशआर 0ग़ज़ल 59
ग़ज़ल59
आँख उठी मोहब्बत ने अंगड़ाई ली
آنکھ اٹھی محبت نے انگڑائی لی
काश उठें हम भी गुनाहगारों के बीच
کاش اٹھیں ہم بھی گنہ گاروں کے بیچ
यूँ सजा चाँद कि छलका तेरे अंदाज़ का रंग
یوں سجا چاند کہ جھلکا ترے انداز کا رنگ
जो मिटा है तेरे जमाल पर वो हर एक ग़म से गुज़र गया
جو مٹا ہے تیرے جمال پر وہ ہر ایک غم سے گزر گیا
है किस क़दर हलाक-ए-फ़रेब-ए-वफ़ा-ए-गुल
ہے کس قدر ہلاک فریب وفائے گل
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