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इश्क़

सभी 228अशआर 0ग़ज़ल 228
ग़ज़ल228
हस्ती अपनी हबाब की सी है
ہستی اپنی حباب کی سی ہے
मेरी लौ लगी है तुझसे ग़म-ए-ज़िंदगी मिटा दे
مری لو لگی ہے تجھ سے غم زندگی مٹا دے
उम्र भर हम रहे शराबी से
عمر بھر ہم رہے شرابی سے
अश्क आँखों में कब नहीं आता
اشک آنکھوں میں کب نہیں آتا
हाँ वही इश्क़-ओ-मोहब्बत की जला होती है
ہاں وہی عشق و محبت کی جلا ہوتی ہے
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