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कभी कभी याद में उभरते हैं नक़्श-ए-माज़ी मिटे मिटे से
کبھی کبھی یاد میں ابھرتے ہیں نقشِ ماضی مٹے مٹے سے
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जिन के लिए अपने तो यूं जान निकलते हैं
جن کے لیے اپنے تو یوں جان نکلتے ہیں
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कोफ़्त से जान लब पे आई है
کوفت سے جان لب پہ آئی ہے
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क्या करूं शरह-ए-ख़स्ता जानी की
کیا کروں شرح خستہ جانی کی
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न अब रक़ीब न नासेह न ग़म-गुसार कोई
نہ اب رقیب نہ ناصح نہ غم گسار کوئی
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