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जुदाई

सभी 50अशआर 0ग़ज़ल 50
ग़ज़ल50
कभी कभी याद में उभरते हैं नक़्श-ए-माज़ी मिटे मिटे से
کبھی کبھی یاد میں ابھرتے ہیں نقشِ ماضی مٹے مٹے سے
जिन के लिए अपने तो यूं जान निकलते हैं
جن کے لیے اپنے تو یوں جان نکلتے ہیں
कोफ़्त से जान लब पे आई है
کوفت سے جان لب پہ آئی ہے
क्या करूं शरह-ए-ख़स्ता जानी की
کیا کروں شرح خستہ جانی کی
न अब रक़ीब न नासेह न ग़म-गुसार कोई
نہ اب رقیب نہ ناصح نہ غم گسار کوئی
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