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राज़-ए-उल्फ़त छुपा के देख लिया
راز الفت چھپا کے دیکھ لیا
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जो क़ुर्बतों के नशे थे वो अब उतरने लगे
جو قربتوں کے نشے تھے وہ اب اترنے لگے
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दुआ का टूटा हुआ हर्फ़ सर्द आह में है
دعا کا ٹوٹا ہوا حرف سرد آہ میں ہے
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बहुत रोया वो हम को याद कर के
بہت رویا وہ ہم کو یاد کر کے
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कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगी
کمال ضبط کو خود بھی تو آزماؤں گی
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