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ग़ज़ल3
हर तमाशाई फ़क़त साहिल से मंज़र देखता
ہر تماشائی فقط ساحل سے منظر دیکھتا
अश्क आँख में फिर अटक रहा है
اشک آنکھ میں پھر اٹک رہا ہے
दिल मुनाफ़िक़ था शब-ए-हिज्र में सोया कैसा
دل منافق تھا شب ہجر میں سویا کیسا
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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