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हर तमाशाई फ़क़त साहिल से मंज़र देखता
अहमद फ़राज़ द्वारा
ہر تماشائی فقط ساحل سے منظر دیکھتا
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अश्क आँख में फिर अटक रहा है
परवीन शाकिर द्वारा
اشک آنکھ میں پھر اٹک رہا ہے
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दिल मुनाफ़िक़ था शब-ए-हिज्र में सोया कैसा
अहमद फ़राज़ द्वारा
دل منافق تھا شب ہجر میں سویا کیسا
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