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सभी 23अशआर 0ग़ज़ल 23
ग़ज़ल23
हस्ती अपनी हबाब की सी है
ہستی اپنی حباب کی سی ہے
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
سنا ہے لوگ اسے آنکھ بھر کے دیکھتے ہیں
किए आरज़ू से पैमां जो मा'ल तक न पहुंचे
کیے آرزو سے پیماں جو مآل تک نہ پہنچے
अपने घर की खिड़की से मैं आसमान को देखूँगा
اپنے گھر کی کھڑکی سے میں آسمان کو دیکھوں گا
बंद था दरवाज़ा भी और घर में भी तन्हा था मैं
بند تھا دروازہ بھی اور گھر میں بھی تنہا تھا میں
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