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माज़ी

सभी 28अशआर 0ग़ज़ल 28
ग़ज़ल28
न हम रहे न वो ख़्वाबों की ज़िंदगी ही रही
نہ ہم رہے نہ وہ خوابوں کی زندگی ہی رہی
ख़्वाब के रंग दिल-ओ-जाँ में सजाए भी गए
خواب کے رنگ دل و جاں میں سجائے بھی گئے
ख़्वाब की हालतों के साथ तेरी हिकायतों में हैं
خواب کی حالتوں کے ساتھ تیری حکایتوں میں ہیں
हम भी शायर थे कभी जान-ए-सुख़न याद नहीं
ہم بھی شاعر تھے کبھی جان سخن یاد نہیں
ख़ूब थे वे दिन कि हम तेरे गिरफ़्तारों में थे
خوب تھے وے دن کہ ہم تیرے گرفتاروں میں تھے
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