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मायूसी

सभी 103अशआर 0ग़ज़ल 103
ग़ज़ल103
ये पैहम तल्ख़-कामी सी रही क्या
یہ پیہم تلخ کامی سی رہی کیا
सारे रिश्ते तबाह कर आया
سارے رشتے تباہ کر آیا
है अजब हाल ये ज़माने का
ہے عجب حال یہ زمانے کا
जुज़ गुमाँ और था ही क्या मेरा
جز گماں اور تھا ہی کیا میرا
बे-क़रारी सी बे-क़रारी है
بے قراری سی بے قراری ہے
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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