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कुछ मुहतसिबों की ख़लवत में कुछ वाइज़ के घर जाती है
کچھ محتسبوں کی خلوت میں کچھ واعظ کے گھر جاتی ہے
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शफ़क़ की राख में जल बुझ गया सितारा-ए-शाम
شفق کی راکھ میں جل بجھ گیا ستارۂ شام
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एक परवाज़ को भी रुख़सत-ए-सय्याद नहीं
ایک پرواز کو بھی رخصت صیاد نہیں
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हमारे आगे तिरा जब कसू ने नाम लिया
ہمارے آگے ترا جب کسو نے نام لیا
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हटी ज़ुल्फ़ उनके चेहरे से मगर आहिस्ता आहिस्ता
ہٹی زلف ان کے چہرے سے مگر آہستہ آہستہ
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