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क़फ़स

सभी 28अशआर 0ग़ज़ल 28
ग़ज़ल28
कुछ मुहतसिबों की ख़लवत में कुछ वाइज़ के घर जाती है
کچھ محتسبوں کی خلوت میں کچھ واعظ کے گھر جاتی ہے
शफ़क़ की राख में जल बुझ गया सितारा-ए-शाम
شفق کی راکھ میں جل بجھ گیا ستارۂ شام
एक परवाज़ को भी रुख़सत-ए-सय्याद नहीं
ایک پرواز کو بھی رخصت صیاد نہیں
हमारे आगे तिरा जब कसू ने नाम लिया
ہمارے آگے ترا جب کسو نے نام لیا
हटी ज़ुल्फ़ उनके चेहरे से मगर आहिस्ता आहिस्ता
ہٹی زلف ان کے چہرے سے مگر آہستہ آہستہ
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