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होती है गरचह कहने से यारो पराई बात
ہوتی ہے گرچہ کہنے سے یارو پرائی بات
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जो ग़ैर थे वो इसी बात पर हमारे हुए
جو غیر تھے وہ اسی بات پر ہمارے ہوئے
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है किस क़दर हलाक-ए-फ़रेब-ए-वफ़ा-ए-गुल
ہے کس قدر ہلاک فریب وفائے گل
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बला से हो शाम की सियाही कहीं तो मंज़िल मरी मिलेगी
بلا سے ہو شام کی سیاہی کہیں تو منزل مری ملے گی
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कहाँ तक ग़ैर जासूसी के लेने को लगा आवे
کہاں تک غیر جاسوسی کے لینے کو لگا آوے
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