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रक़ीब

सभी 15अशआर 0ग़ज़ल 15
ग़ज़ल15
होती है गरचह कहने से यारो पराई बात
ہوتی ہے گرچہ کہنے سے یارو پرائی بات
जो ग़ैर थे वो इसी बात पर हमारे हुए
جو غیر تھے وہ اسی بات پر ہمارے ہوئے
है किस क़दर हलाक-ए-फ़रेब-ए-वफ़ा-ए-गुल
ہے کس قدر ہلاک فریب وفائے گل
बला से हो शाम की सियाही कहीं तो मंज़िल मरी मिलेगी
بلا سے ہو شام کی سیاہی کہیں تو منزل مری ملے گی
कहाँ तक ग़ैर जासूसी के लेने को लगा आवे
کہاں تک غیر جاسوسی کے لینے کو لگا آوے
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