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सभी 7अशआर 0ग़ज़ल 7
ग़ज़ल7
दिल जो ज़ेर-ए-ग़ुबार अक्सर था
دل جو زیر غبار اکثر تھا
हैरान है जबीं आज किधर सज्दा रवां है
حیراں ہے جبیں آج کدھر سجدہ روا ہے
वो आग़ाज़-ए-मोहब्बत का ज़माना
وہ آغاز محبت کا زمانہ
दोनों हैं उन के हिज्र का हासिल लिये हुए
دونوں ہیں ان کے ہجر کا حاصل لئے ہوئے
दूरियाँ सिमटने में देर कुछ तो लगती है
دوریاں سمٹنے میں دیر کچھ تو لگتی ہے
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