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शब-ए-फ़ुर्क़त
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ताना ज़न था हर कोई हम पर दिल-ए-नादाँ समेत
طعنہ زن تھا ہر کوئی ہم پر دل ناداں سمیت
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शफ़क़ की राख में जल बुझ गया सितारा-ए-शाम
شفق کی راکھ میں جل بجھ گیا ستارۂ شام
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अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएं हम
اب اور کیا کسی سے مراسم بڑھائیں ہم
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आह जिस वक़्त सर उठाती है
آہ جس وقت سر اٹھاتی ہے
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न हरीफ़-ए-जाँ न शरीक-ए-ग़म शब-ए-इंतज़ार कोई तो हो
نہ حریف جاں نہ شریک غم شب انتظار کوئی تو ہو
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