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सभी 145अशआर 0ग़ज़ल 145
ग़ज़ल145
वो मिरी चीन-ए-जबीं से ग़म-ए-पिन्हाँ समझा
وہ مری چین جبیں سے غم پنہاں سمجھا
टूटी है मेरी नींद मगर तुम को इस से क्या
ٹوٹی ہے میری نیند مگر تم کو اس سے کیا
इल्ज़ाम था दिये पे न तक़्सीर रात की
الزام تھا دیے پہ نہ تقصیر رات کی
आवाज़ के हम राह सरापा भी तो देखूँ
آواز کے ہم راہ سراپا بھی تو دیکھوں
जाना कि शुग़्ल रखते हो तीर-ओ-कमाँ से तुम
جانا کہ شغل رکھتے ہو تیر و کماں سے تم
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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