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वो मिरी चीन-ए-जबीं से ग़म-ए-पिन्हाँ समझा
وہ مری چین جبیں سے غم پنہاں سمجھا
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टूटी है मेरी नींद मगर तुम को इस से क्या
ٹوٹی ہے میری نیند مگر تم کو اس سے کیا
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इल्ज़ाम था दिये पे न तक़्सीर रात की
الزام تھا دیے پہ نہ تقصیر رات کی
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आवाज़ के हम राह सरापा भी तो देखूँ
آواز کے ہم راہ سراپا بھی تو دیکھوں
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जाना कि शुग़्ल रखते हो तीर-ओ-कमाँ से तुम
جانا کہ شغل رکھتے ہو تیر و کماں سے تم
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