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सभी 145अशआर 0ग़ज़ल 145
ग़ज़ल145
ख़ूबरू सब की जान होते हैं
خوبرو سب کی جان ہوتے ہیں
हँसते हो रोते देख कर ग़म से
ہنستے ہو روتے دیکھ کر غم سے
दामन वसीअ था तो काहे को चश्म तरसा
دامن وسیع تھا تو کاہے کو چشم ترسا
मुझे ग़र्ज़ है मेरी जान ग़ुल मचाने से
مجھے غرض ہے مری جان غل مچانے سے
हम जी रहे हैं कोई बहाना किए बग़ैर
ہم جی رہے ہیں کوئی بہانہ کیے بغیر
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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