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उल्फ़त

सभी 3अशआर 0ग़ज़ल 3
ग़ज़ल3
आँख उठी मोहब्बत ने अंगड़ाई ली
آنکھ اٹھی محبت نے انگڑائی لی
मैं फ़क़त चलती रही मंज़िल को सर उस ने किया
میں فقط چلتی رہی منزل کو سر اس نے کیا
बे कसाना जी गिरफ़्तारी से शिवन में रहा
بے کسانہ جی گرفتاری سے شیون میں رہا
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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