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अर्ज़-ओ-समा कहाँ तेरी वुसअत को पा सके
ارض و سما کہاں تری وسعت کو پا سکے
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मदरसा या दैर था या काबा या बुत-ख़ाना था
مدرسہ یا دیر تھا یا کعبہ یا بت خانہ تھا
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गर्म फ़रियाद रक्खा शक्ल-ए-निहाली ने मुझे
گرم فریاد رکھا شکل نہالی نے مجھے
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फ़ुर्क़त में वसलत बरपा है अल्लाह हू के बाड़े में
فرقت میں وصلت برپا ہے اللہ ہو کے باڑے میں
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