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राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या
راہ دور عشق میں روتا ہے کیا
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रफ़्तगां में जहां के हम भी हैं
رفتگاں میں جہاں کے ہم بھی ہیں
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लज़्ज़त से नहीं ख़ाली जानों का खपा जाना
لذت سے نہیں خالی جانوں کا کھپا جانا
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जैसे हम बज़्म हैं फिर यार-ए-तरह-दार से हम
جیسے ہم بزم ہیں پھر یار طرح دار سے ہم
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होती है गरचह कहने से यारो पराई बात
ہوتی ہے گرچہ کہنے سے یارو پرائی بات
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