Jaise Hum Bazm Hain Phir Yaar-e-Tarah-daar Se Hum
جیسے ہم بزم ہیں پھر یار طرح دار سے ہم
जैसे हम बज़्म हैं फिर यार-ए-तरह-दार से हम
ग़ज़ल
१ मिनट पढ़ने मेंجیسے ہم بزم ہیں پھر یار طرح دار سے ہم
رات ملتے رہے اپنے در و دیوار سے ہم
Jaise hum bazm hain phir yaar-e-tarah-daar se hum
Raat milte rahe apne dar-o-deewaar se hum
जैसे हम बज़्म हैं फिर यार-ए-तरह-दार से हम
रात मिलते रहे अपने दर-ओ-दीवार से हम
سر خوشی میں یونہی دل شاد و غزل خواں گزرے
کوئے قاتل سے کبھی کوچۂ دل دار سے ہم
Sar-khushi mein yunhi dil shaad-o-ghazal-khwaan guzre
Koo-e-qaatil se kabhi koocha-e-dildaar se hum
सर-ख़ुशी में यूँही दिल शाद-ओ-ग़ज़ल-ख़्वां गुज़रे
कू-ए-क़ातिल से कभी कूचा-ए-दिलदार से हम
کبھی منزل کبھی رستے نے ہمیں ساتھ دیا
ہر قدم الجھے رہے قافلہ سالار سے ہم
Kabhi manzil kabhi raste ne hamein saath diya
Har qadam uljhe rahe qaafila-saalaar se hum
कभी मंज़िल कभी रस्ते ने हमें साथ दिया
हर क़दम उलझे रहे क़ाफ़िला-सालार से हम

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ उर्दू के वो अहद-साज़ शायर हैं जिन्होंने इश्क़ की नफ़ासत को इन्क़िलाबी सोच से जोड़कर दुनिया भर में शौहरत हासिल की और अपने विचारों के लिए जेल भी गए।
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