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वस्ल

सभी 8अशआर 0ग़ज़ल 8
ग़ज़ल8
हुज़ूर-ए-यार में हर्फ़-ए-इल्तिजा के रक्खे थे
حضور یار میں حرف التجا کے رکھے تھے
मक़ाम-ए-होश से गुज़रा मकाँ से ला-मकाँ पहुँचा
مقام ہوش سے گزرا مکاں سے لا مکاں پہنچا
जब भी आँखों में तिरे वस्ल का लम्हा चमका
جب بھی آنکھوں میں ترے وصل کا لمحہ چمکا
रुकी हुई है अभी तक बहार आँखों में
رکی ہوئی ہے ابھی تک بہار آنکھوں میں
रंग ख़ुशबू में अगर हल हो जाए
رنگ خوش بو میں اگر حل ہو جائے
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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