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हुज़ूर-ए-यार में हर्फ़-ए-इल्तिजा के रक्खे थे
Amjad Islam Amjad द्वारा
حضور یار میں حرف التجا کے رکھے تھے
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मक़ाम-ए-होश से गुज़रा मकाँ से ला-मकाँ पहुँचा
फ़ना बुलंदशहरी द्वारा
مقام ہوش سے گزرا مکاں سے لا مکاں پہنچا
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जब भी आँखों में तिरे वस्ल का लम्हा चमका
Amjad Islam Amjad द्वारा
جب بھی آنکھوں میں ترے وصل کا لمحہ چمکا
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रुकी हुई है अभी तक बहार आँखों में
परवीन शाकिर द्वारा
رکی ہوئی ہے ابھی تک بہار آنکھوں میں
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रंग ख़ुशबू में अगर हल हो जाए
परवीन शाकिर द्वारा
رنگ خوش بو میں اگر حل ہو جائے
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याद उसे इंतिहाई करते हैं
जौन एलिया द्वारा
یاد اسے انتہائی کرتے ہیں
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आख़िरी बार आह कर ली है
जौन एलिया द्वारा
آخری بار آہ کر لی ہے
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फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया
मिर्ज़ा ग़ालिब द्वारा
پھر مجھے دیدۂ تر یاد آیا
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