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वहशत
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ग़ज़ल
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ऐश उम्मीद ही से ख़तरा है
عیش امید ہی سے خطرہ ہے
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वहशत थी हमें भी वही घर बार से अब तक
وحشت تھی ہمیں بھی وہی گھر بار سے اب تک
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وحشتیں بڑھتی گئیں ہجر کے آزار کے ساتھ
وحشتیں بڑھتی گئیں ہجر کے آزار کے ساتھ
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दिल पे इक तरफ़ा क़यामत करना
دل پہ اک طرفہ قیامت کرنا
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अभी इक शोर सा उठा है कहीं
ابھی اک شور سا اٹھا ہے کہیں
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