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लख़्त-ए-जिगर तो अपने यक लख़्त रो चुका था
لخت جگر تو اپنے یک لخت رو چکا تھا
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क्या करे मेरी मसीहाई भी करने वाला
کیا کرے میری مسیحائی بھی کرنے والا
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क्या बुलबुल असीर है बे बाल-ओ-पर कि हम
کیا بلبل اسیر ہے بے بال و پر کہ ہم
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ग़मज़े ने उस के चोरी में दिल की हुनर किया
غمزے نے اس کے چوری میں دل کی ہنر کیا
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क्यों न हम अहद-ए-रफ़ाक़त को भुलाने लग जाएँ
کیوں نہ ہم عہد رفاقت کو بھلانے لگ جائیں
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