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ज़ंजीर

सभी 8अशआर 0ग़ज़ल 8
ग़ज़ल8
कुछ मौज-ए-हवा-ए-पेचां ऐ मीर नज़र आई
کچھ موج ہوا پیچاں اے میرؔ نظر آئی
मुंतज़िर कब से तहय्युर है तेरी तक़रीर का
منتظر کب سے تحیر ہے تری تقریر کا
ऐसे चुप हैं कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे
ایسے چپ ہیں کہ یہ منزل بھی کڑی ہو جیسے
अब्रू तो दिखा दीजिए शमशीर से पहले
ابرو تو دکھا دیجئے شمشیر سے پہلے
रिदा-ए-ज़ख़्म हर गुल-पैरहन पहने हुए है
ردائے زخم ہر گل پیرہن پہنے ہوئے ہے
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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