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कुछ मौज-ए-हवा-ए-पेचां ऐ मीर नज़र आई
کچھ موج ہوا پیچاں اے میرؔ نظر آئی
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मुंतज़िर कब से तहय्युर है तेरी तक़रीर का
منتظر کب سے تحیر ہے تری تقریر کا
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ऐसे चुप हैं कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे
ایسے چپ ہیں کہ یہ منزل بھی کڑی ہو جیسے
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अब्रू तो दिखा दीजिए शमशीर से पहले
ابرو تو دکھا دیجئے شمشیر سے پہلے
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रिदा-ए-ज़ख़्म हर गुल-पैरहन पहने हुए है
ردائے زخم ہر گل پیرہن پہنے ہوئے ہے
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