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ज़िंदगी का फ़लसफ़ा
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क़ुर्बतों में भी जुदाई के ज़माने माँगे
قربتوں میں بھی جدائی کے زمانے مانگے
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अब के बरस दस्तूर-ए-सितम में क्या क्या बाब ईज़ाद हुए
اب کے برس دستور ستم میں کیا کیا باب ایزاد ہوئے
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क्या मैं भी परेशानी-ए-ख़ातिर से क़रीं था
کیا میں بھی پریشانیٔ خاطر سے قریں تھا
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तेरे होते हुए महफ़िल में जलाते हैं चराग़
تیرے ہوتے ہوئے محفل میں جلاتے ہیں چراغ
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अपनी ही आवाज़ को बे शक कान में रखना
اپنی ہی آواز کو بے شک کان میں رکھنا
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