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हटी ज़ुल्फ़ उनके चेहरे से मगर आहिस्ता आहिस्ता
ہٹی زلف ان کے چہرے سے مگر آہستہ آہستہ
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अगर छोटा भी इस से आइना-ख़ाना तो क्या होगा
اگر چھوٹا بھی اس سے آئنہ خانہ تو کیا ہوگا
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लाغر इतना हूँ कि गर तू बज़्म में जा दे मुझे
لاغر اتنا ہوں کہ گر تو بزم میں جا دے مجھے
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मुझ को दयार-ए-ग़ैर में मारा वतन से दूर
مجھ کو دیار غیر میں مارا وطن سے دور
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ख़ुश क़दाँ जब सवार होते हैं
خوش قداں جب سوار ہوتے ہیں
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