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ज़ुल्फ़

सभी 8अशआर 0ग़ज़ल 8
ग़ज़ल8
हटी ज़ुल्फ़ उनके चेहरे से मगर आहिस्ता आहिस्ता
ہٹی زلف ان کے چہرے سے مگر آہستہ آہستہ
अगर छोटा भी इस से आइना-ख़ाना तो क्या होगा
اگر چھوٹا بھی اس سے آئنہ خانہ تو کیا ہوگا
लाغر इतना हूँ कि गर तू बज़्म में जा दे मुझे
لاغر اتنا ہوں کہ گر تو بزم میں جا دے مجھے
मुझ को दयार-ए-ग़ैर में मारा वतन से दूर
مجھ کو دیار غیر میں مارا وطن سے دور
ख़ुश क़दाँ जब सवार होते हैं
خوش قداں جب سوار ہوتے ہیں
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