Hawa Hi Lau Ko Ghatati Wahi Barhati Hai
ہوا ہی لو کو گھٹاتی وہی بڑھاتی ہے
हवा ही लौ को घटाती वही बढ़ाती है
ग़ज़ल
१ मिनट पढ़ने मेंہوا ہی لو کو گھٹاتی وہی بڑھاتی ہے
یہ کس گمان میں دنیا دیے جلاتی ہے
Hawa hi lau ko ghatati wahi barhati hai
Bhatakne walon ko kya farq is se parta hai
Safar mein kaun sarak kis taraf ko jaati hai
Ajeeb khauf ka gumbad hai mere chaar taraf
Miri sada mire kaanon mein laut aati hai
Woh jis bhi raah se guzre jahan qiyaam kare
Zameen wahan ki sitaron se bharti jaati hai
Yeh zindagi bhi kahin ho na Shehrzaad ka roop
Shabana-roz kahani nayi sunati hai
हवा ही लौ को घटाती वही बढ़ाती है
भटकने वालों को क्या फ़र्क़ इस से पड़ता है
सफ़र में कौन सड़क किस तरफ़ को जाती है
अजीब ख़ौफ़ का गुम्बद है मेरे चार तरफ़
मिरी सदा मिरे कानों में लौट आती है
वो जिस भी राह से गुज़रे जहां क़ियाम करे
ज़मीं वहां की सितारों से भरती जाती है
ये ज़िंदगी भी कहीं हो न शहरज़ाद का रूप
शबाना-रोज़ कहानी नई सुनाती है

अमजद इस्लाम अमजद उर्दू के वो मशहूर और मकबूल शायर और नाटककार (ड्रामा राइटर) थे, जिन्होंने अपनी असरदार शायरी और टीवी के बेहतरीन ड्रामों से लोगों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी।
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