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तन्हाई

सभी 169अशआर 0ग़ज़ल 169
ग़ज़ल169
नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही
نہیں نگاہ میں منزل تو جستجو ہی سہی
वो तफ़ावुतें हैं मरे ख़ुदा कि ये तो नहीं कोई और है
وہ تفاوتیں ہیں مرے خدا کہ یہ تو نہیں کوئی اور ہے
आप की याद आती रही रात भर
آپ کی یاد آتی رہی رات بھر
वह अहद-ए-ग़म की काहिश-हाए-बे-हासिल को क्या समझें
وہ عہد غم کی کاہش ہائے بے حاصل کو کیا سمجھے
रफ़ाक़तों में पशेमानियाँ तो होती हैं
رفاقتوں میں پشیمانیاں تو ہوتی ہیں
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