Mujh Ko Dayar-e-Ghair Mein Maara Watan Se Door

مجھ کو دیار غیر میں مارا وطن سے دور

मुझ को दयार-ए-ग़ैर में मारा वतन से दूर

ग़ज़ल

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مجھ کو دیار غیر میں مارا وطن سے دور
رکھ لی مرے خدا نے مری بیکسی کی شرم

Mujh ko dayar-e-ghair mein maara watan se door
Rakh li mere khuda ne meri bekasi ki sharm

मुझ को दयार-ए-ग़ैर में मारा वतन से दूर
रख ली मिरे ख़ुदा ने मिरी बेकसी की शर्म

وہ حلقہ ‌ہاۓ زلف کمیں میں ہیں یا خدا
رکھ لیجو میرے دعوی وارستگی کی شرم

Woh halqa-haaye zulf kameen mein hain ya khuda
Rakh lijo mere daawa-e-warastagi ki sharm

वो हल्क़ा-हा-ए-ज़ुल्फ़ कमीं में हैं या ख़ुदा
रख लीजो मेरे दा'वा-ए-वारस्तगी की शर्म


मिर्ज़ा ग़ालिब

शास्त्रीय

मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू के वो अज़ीम और मशहूर शायर हैं, जिन्होंने क्लासिकी और जदीद दौर के बीच एक पुल का काम किया, और जिनके शेर आज भी इंसानी ज़िन्दगी के हर पहलू को बयान करते हैं।

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