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मेरी लौ लगी है तुझसे ग़म-ए-ज़िंदगी मिटा दे
फ़ना बुलंदशहरी द्वारा
مری لو لگی ہے تجھ سے غم زندگی مٹا دے
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मक्का गया मदीना गया कर्बला गया
मीर तक़ी मीर द्वारा
مکہ گیا مدینہ گیا کربلا گیا
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हर हक़ीक़त मज़ाज़ हो जाए
فیض احمد فیض द्वारा
ہر حقیقت مجاز ہو جائے
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ग़नीम से भी अदावत में हद नहीं मांगी
अहमद फ़राज़ द्वारा
غنیم سے بھی عداوت میں حد نہیں مانگی
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अब हाल अपना उस के है दिल-ख़्वाह
मीर तक़ी मीर द्वारा
اب حال اپنا اس کے ہے دل خواہ
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मुझ को दयार-ए-ग़ैर में मारा वतन से दूर
मिर्ज़ा ग़ालिब द्वारा
مجھ کو دیار غیر میں مارا وطن سے دور
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नक़्श बैठे है कहाँ ख़्वाहिश-ए-आज़ादी का
मीर तक़ी मीर द्वारा
نقش بیٹھے ہے کہاں خواہش آزادی کا
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हो आजिज़ कि जिस्म इस क़दर ज़ोर से
मीर तक़ी मीर द्वारा
ہو عاجز کہ جسم اس قدر زور سے
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तेरी गली में मैं न चलूँ और सबा चले
ख़्वाजा मीर दर्द द्वारा
تیری گلی میں میں نہ چلوں اور صبا چلے
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कब से नज़र लगी थी दरवाज़-ए-हरम से
मीर तक़ी मीर द्वारा
کب سے نظر لگی تھی دروازۂ حرم سے
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जो कहो तुम सो है बजा साहब
मीर तक़ी मीर द्वारा
جو کہو تم سو ہے بجا صاحب
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तग़ाफ़ुल दोस्त हूँ मेरा दिमाग़ अज्ज़ आली है
मिर्ज़ा ग़ालिब द्वारा
تغافل دوست ہوں میرا دماغ عجز عالی ہے
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लाग़र इतना हूँ कि गर तू बज़्म में जा दे मुझे
मिर्ज़ा ग़ालिब द्वारा
لاغر اتنا ہوں کہ گر تو بزم میں جا دے مجھے
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चाक पर चाक हुआ जूँ जूँ सिलाया हम ने
मीर तक़ी मीर द्वारा
چاک پر چاک ہوا جوں جوں سلایا ہم نے
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