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बख़्त से कोई शिकायत है न अफ़लाक से है
بخت سے کوئی شکایت ہے نہ افلاک سے ہے
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नाले का आज दिल से फिर लब तलक गुज़र है
نالے کا آج دل سے پھر لب تلک گزر ہے
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जल्वा जो तेरे रुख़ का एहसास में ढल जाए
جلوہ جو ترے رخ کا احساس میں ڈھل جائے
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ख़बर ही नहीं कैसे अंगड़ाई ले कर निगाहें उठाए कि साग़र उठाए
خبر ہی نہیں کیسے انگڑائی لے کر نگاہیں اٹھائے کہ ساغر اٹھائے
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लख़्त-ए-जिगर तो अपने यक लख़्त रो चुका था
لخت جگر تو اپنے یک لخت رو چکا تھا
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