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आशिक़ी

सभी 105अशआर 0ग़ज़ल 105
ग़ज़ल105
अब वही हर्फ़-ए-जुनूं सब की ज़बां ठहरी है
اب وہی حرف جنوں سب کی زباں ٹھہری ہے
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
پتا پتا بوٹا بوٹا حال ہمارا جانے ہے
लज़्ज़त से नहीं ख़ाली जानों का खपा जाना
لذت سے نہیں خالی جانوں کا کھپا جانا
गुल को महबूब हम क़यास किया
گل کو محبوب ہم قیاس کیا
आए हैं मीर काफ़िर हो कर ख़ुदा के घर में
آئے ہیں میرؔ کافر ہو کر خدا کے گھر میں
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