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अब वही हर्फ़-ए-जुनूं सब की ज़बां ठहरी है
اب وہی حرف جنوں سب کی زباں ٹھہری ہے
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पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
پتا پتا بوٹا بوٹا حال ہمارا جانے ہے
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लज़्ज़त से नहीं ख़ाली जानों का खपा जाना
لذت سے نہیں خالی جانوں کا کھپا جانا
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गुल को महबूब हम क़यास किया
گل کو محبوب ہم قیاس کیا
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आए हैं मीर काफ़िर हो कर ख़ुदा के घर में
آئے ہیں میرؔ کافر ہو کر خدا کے گھر میں
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