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आशिक़ी

सभी 105अशआर 0ग़ज़ल 105
ग़ज़ल105
दुनिया के हर ख़याल से बेगाना कर दिया
دنیا کے ہر خیال سے بیگانہ کر دیا
आप बैठे हैं बालें पे मेरी मौत का ज़ोर चलता नहीं है
آپ بیٹھے ہیں بالیں پہ میری موت کا زور چلتا نہیں ہے
काश उठें हम भी गुनाहगारों के बीच
کاش اٹھیں ہم بھی گنہ گاروں کے بیچ
जो मिटा है तेरे जमाल पर वो हर एक ग़म से गुज़र गया
جو مٹا ہے تیرے جمال پر وہ ہر ایک غم سے گزر گیا
इस का ख़राम देख के जाया न जाएगा
اس کا خرام دیکھ کے جایا نہ جائے گا
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