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कल मीर ने क्या क्या की मय के लिए बेताबी
کل میرؔ نے کیا کیا کی مے کے لیے بیتابی
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दहर भी 'मीर' तुर्फ़ा मक़्तल है
دہر بھی میرؔ طرفہ مقتل ہے
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अब ज़ोफ़ से ढहता है बेताबी शिताबि की
اب ضعف سے ڈھہتا ہے بیتابی شتابی کی
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एक ही मुज़्दा सुब्ह लाती है
ایک ہی مژدہ صبح لاتی ہے
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ग़ुबार-ए-दश्त-ए-तलब में हैं रफ़्तगाँ क्या क्या
غبار دشت طلب میں ہیں رفتگاں کیا کیا
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