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सभी 94अशआर 0ग़ज़ल 94
ग़ज़ल94
कल मीर ने क्या क्या की मय के लिए बेताबी
کل میرؔ نے کیا کیا کی مے کے لیے بیتابی
दहर भी 'मीर' तुर्फ़ा मक़्तल है
دہر بھی میرؔ طرفہ مقتل ہے
अब ज़ोफ़ से ढहता है बेताबी शिताबि की
اب ضعف سے ڈھہتا ہے بیتابی شتابی کی
एक ही मुज़्दा सुब्ह लाती है
ایک ہی مژدہ صبح لاتی ہے
ग़ुबार-ए-दश्त-ए-तलब में हैं रफ़्तगाँ क्या क्या
غبار دشت طلب میں ہیں رفتگاں کیا کیا
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