ADABKHANA
शोअरा
ग़ज़लें
अशआर
मुहावरे
लुग़त
और
कुल्लियात
टैग्स
खोज
ENG
URD
HIN
Login
प्रोफ़ाइल संपादित करें
मेरी पसंदीदा
लॉग आउट
ENG
URD
HIN
Login
प्रोफ़ाइल संपादित करें
मेरी पसंदीदा
लॉग आउट
खोज
लॉगिन
रजिस्टर करें
लॉगिन करें
खाता बनाएँ
← टैग्स पर वापस
बे-सबाती
सभी
94
अशआर
0
ग़ज़ल
94
ग़ज़ल
94
0
ख़ंजर ब-कफ़ वो जब से सफ़्फ़ाक हो गया है
خنجر بکف وہ جب سے سفاک ہو گیا ہے
0
रमक़ एक जान वबाल है कोई दम जो है तो अज़ाब है
رمق ایک جان وبال ہے کوئی دم جو ہے تو عذاب ہے
0
किस हुस्न से कहूँ मैं उस की ख़ुश अख़्तरी की
کس حسن سے کہوں میں اس کی خوش اختری کی
0
ज़बाँ रख ग़ुंचा सा अपने दहन में
زباں رکھ غنچہ ساں اپنے دہن میں
0
बाहर गुज़ार दी कभी अंदर भी आएंगे
باہر گزار دی کبھی اندر بھی آئیں گے
सभी देखें
← पिछला
अगला →
कवियों की सूची
कवियों
और जानें