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बे-सबाती

सभी 94अशआर 0ग़ज़ल 94
ग़ज़ल94
ख़ंजर ब-कफ़ वो जब से सफ़्फ़ाक हो गया है
خنجر بکف وہ جب سے سفاک ہو گیا ہے
रमक़ एक जान वबाल है कोई दम जो है तो अज़ाब है
رمق ایک جان وبال ہے کوئی دم جو ہے تو عذاب ہے
किस हुस्न से कहूँ मैं उस की ख़ुश अख़्तरी की
کس حسن سے کہوں میں اس کی خوش اختری کی
ज़बाँ रख ग़ुंचा सा अपने दहन में
زباں رکھ غنچہ ساں اپنے دہن میں
बाहर गुज़ार दी कभी अंदर भी आएंगे
باہر گزار دی کبھی اندر بھی آئیں گے
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