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सभी 94अशआर 0ग़ज़ल 94
ग़ज़ल94
समझे थे मीरؔ हम कि यह नासूर कम हुआ
سمجھے تھے میرؔ ہم کہ یہ ناسور کم ہوا
कैसा चमन असीरी में किस को इधर ख़याल
کیسا چمن اسیری میں کس کو ادھر خیال
हम कहाँ और तुम कहाँ जानाँ
ہم کہاں اور تم کہاں جاناں
शौक़ का रंग बुझ गया याद के ज़ख़्म भर गए
شوق کا رنگ بجھ گیا یاد کے زخم بھر گئے
मैं न ठहरूँ न जान तू ठहरे
میں نہ ٹھہروں نہ جان تو ٹھہرے
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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