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समझे थे मीरؔ हम कि यह नासूर कम हुआ
سمجھے تھے میرؔ ہم کہ یہ ناسور کم ہوا
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कैसा चमन असीरी में किस को इधर ख़याल
کیسا چمن اسیری میں کس کو ادھر خیال
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हम कहाँ और तुम कहाँ जानाँ
ہم کہاں اور تم کہاں جاناں
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शौक़ का रंग बुझ गया याद के ज़ख़्म भर गए
شوق کا رنگ بجھ گیا یاد کے زخم بھر گئے
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मैं न ठहरूँ न जान तू ठहरे
میں نہ ٹھہروں نہ جان تو ٹھہرے
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