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दर्द

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ग़ज़ल123
गुल-ओ-बुलबुल बहार में देखा
گل و بلبل بہار میں دیکھا
अश्क आँख में फिर अटक रहा है
اشک آنکھ میں پھر اٹک رہا ہے
दुख नोश्ता है तो आँधी को लिखा आहिस्ता
دکھ نوشتہ ہے تو آندھی کو لکھا آہستہ
गर कुछ हो दर्द आईना यूं चर्ख़-ए-ज़िश्त में
گر کچھ ہو درد آئینہ یوں چرخ زشت میں
जिन के लिए अपने तो यूँ जान निकलते हैं
جن کے لیے اپنے تو یوں جان نکلتے ہیں
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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