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गुल-ओ-बुलबुल बहार में देखा
گل و بلبل بہار میں دیکھا
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अश्क आँख में फिर अटक रहा है
اشک آنکھ میں پھر اٹک رہا ہے
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दुख नोश्ता है तो आँधी को लिखा आहिस्ता
دکھ نوشتہ ہے تو آندھی کو لکھا آہستہ
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गर कुछ हो दर्द आईना यूं चर्ख़-ए-ज़िश्त में
گر کچھ ہو درد آئینہ یوں چرخ زشت میں
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जिन के लिए अपने तो यूँ जान निकलते हैं
جن کے لیے اپنے تو یوں جان نکلتے ہیں
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