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क्या बुलबुल असीर है बे बाल-ओ-पर कि हम
کیا بلبل اسیر ہے بے بال و پر کہ ہم
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रात से आँसू मरी आँखों में फिर आने लगा
رات سے آنسو مری آنکھوں میں پھر آنے لگا
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पलकों पे थे पार-ए-जिगर रात
پلکوں پہ تھے پارۂ جگر رات
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जुदा जो पहलू से वो दिलबर यगाना हुआ
جدا جو پہلو سے وہ دلبر یگانہ ہوا
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ग़लत है इश्क़ में ऐ बुलहवस अंदेशा राहत का
غلط ہے عشق میں اے بوالہوس اندیشہ راحت کا
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