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आम हुक्म-ए-शराब करता हूँ
عام حکم شراب کرتا ہوں
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क़ुर्ब-ए-जानां का न मयख़ाने का मौसम आया
قرب جاناں کا نہ مے خانے کا موسم آیا
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हुस्न-ए-बुतां का इश्क़ मेरी जान हो गया
حسن بتاں کا عشق مری جان ہو گیا
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कई बार इसका दामन भर दिया हुस्न-ए-दो आलम से
کئی بار اس کا دامن بھر دیا حسنِ دو عالم سے
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जो मिटा है तेरे जमाल पर वो हर एक ग़म से गुज़र गया
جو مٹا ہے تیرے جمال پر وہ ہر ایک غم سے گزر گیا
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