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दीवानगी

सभी 33अशआर 0ग़ज़ल 33
ग़ज़ल33
आम हुक्म-ए-शराब करता हूँ
عام حکم شراب کرتا ہوں
क़ुर्ब-ए-जानां का न मयख़ाने का मौसम आया
قرب جاناں کا نہ مے خانے کا موسم آیا
हुस्न-ए-बुतां का इश्क़ मेरी जान हो गया
حسن بتاں کا عشق مری جان ہو گیا
कई बार इसका दामन भर दिया हुस्न-ए-दो आलम से
کئی بار اس کا دامن بھر دیا حسنِ دو عالم سے
जो मिटा है तेरे जमाल पर वो हर एक ग़म से गुज़र गया
جو مٹا ہے تیرے جمال پر وہ ہر ایک غم سے گزر گیا
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