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ग़ज़ल18
हस्ती अपनी हबाब की सी है
ہستی اپنی حباب کی سی ہے
दिल जो ज़ेर-ए-ग़ुबार अक्सर था
دل جو زیر غبار اکثر تھا
जिस सर को ग़ुरूर आज है यां ताजवरी का
جس سر کو غرور آج ہے یاں تاجوری کا
हैरान है जबीं आज किधर सज्दा रवां है
حیراں ہے جبیں آج کدھر سجدہ روا ہے
आ जाएँ हम नज़र जो कोई दम बहुत है यां
آ جائیں ہم نظر جو کوئی دم بہت ہے یاں
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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